बस अब और नहीं
अब जब हो चुका मौत का तांडव
अब जब धुल गये हैं लहू के दाग
बुझा दी गई है होटल की आग
और कुचल दिये वोह विषधर नाग
दब्राया सा जीवन अभी फैला ही रहा है अपने पंख
लेकिन आक्रोश का आवेग
महा-आवेग भी ले रहा है करवटें
हमारे इस आक्रोश की बागडोर
हमारे धार्मिक न राजनितिक नेता अपने हाथ मैं लेंगें
इस बार-
इस आक्रोश की बागडोर हम अपने विवेक के हाथ मैं देंगें
कब तक देंगे
विभत्सता का नंगा न्रत्य
कभी हिंदू त्रिशूलों पे उचलते रक्त-रंजित ब्रून
तो कभी मुसलमान तलवारों से कटती निरीह चातिआं
कभी बम्बों से क्षत -विक्षत लासन के ढेर
तो कभी अथासों के मध्यस्त जिंदा जलते हुये लोग
कब तक देखेंगे !
हाँ इस बार यह आक्रोश
बनेगा "बस और नहीं का उद्घोष"
घरना व् धर्म की राजनीति लके ख़िलाफ़
एक स्पष्ट "बस और नहीं "का रोष
बहुत हो चुकी अंधे प्रतिशोध की परम्परा
तोर दी आज हमने इस उन्माद की श्रृंख्ला
धर्मों की सियासत
ज़हर की विरासत
इन सबसे इनकार की आवाज़ है यह-
"नहीं बस और नहीं" का आवाहन
द्रुर इरादे और चेतन विचार
लिये है हमारा आक्रोश आज
बम्बों-गोलिओं से मारें मासूमों को जो हतियारय
दंगों मैं खुल कर खेलें जो मौत की होली
या मिशंरिओं पे हों जघन्य अपराध
अपने धर्मों के नाम लगें मानवता की बोली
इन सुब्के ख़िलाफ़ है-
हमारे इस आक्रोश की आवाज़
खुली चेतावनी है यह-
घरना के हर व्यापारी को
न्रशंसता के पुजारी को
किसी भी धरम या विचारधारा के नाम
नहीं सह्येंगे हम कोई भी अब क़त्ल-ऐ-आम
"नहीं बस और नहीं"
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